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Showing posts from May, 2020

थोड़ी दुरी

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➤ थोड़ी  दुरी  यह कहानी है दो बच्चों की जो कि एक गांव में रहते थे। एक बच्चे का नाम अंश जो की 6 साल का था और एक बच्चे का नाम ओम जो की 10 साल का था । दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे। दोनों हमेशा साथ-साथ रहते , साथ-साथ खेलते, साथ-साथ खाते - पीते। एक दिन वह दोनों पतंग उड़ाते - उड़ाते गांव से थोड़ा दूर निकल गए और खेलते - खेलते उन दोनों में जो बड़ा बच्चा ओम जो कि 10 साल का था वह कुएं में गिर गया। और जोर-जोर से चीखने चिल्लाने लगा । उसे तैरना भी भी नहीं आता था। अब जो छोटा बच्चा अंश जो की 6 साल का था उसने अपने आसपास देखा पर उसे कोई नजर नहीं आया जिसको वो बुला सके मदद के लिए; और तब उसकी नजर एक बाल्टी पर पडी जो एक रस्सी से बंधी थी। उसने बिना एक पल गवांए उस बाल्टी को कुएं में फेंक दिया और अपने दोस्त को बोला इसे पकड़ लो । उसके दोस्त ने बाल्टी को पकड़ लिया और अंश अपनी पूरी ताकत लगा कर उसे खींचने लगा। खींचता रहा , खींचता रहा उसने अपनी पूरी जान लगा दी। और तब तक खींचा जब तक उसने अपने दोस्त की जान ना बचा ली । आखिरकार उस छोटे से 6 साल के बच्चे अंश ने अपने दोस्त ओम की जान बचा ली, दो...

! शायद !

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किसी  से अपने मन के सुख - दुख बांटना सही है या गलत ? कभी-कभी लगता है कि हम बहुत कमजोर हो जाते हैं तो अपनी भावनाएं , अपने भीतर छुपी बातें , अपनी खुशी या अपनी परेशानी किसी दूसरे इंसान से शेयर करते हैं ; लेकिन क्या वास्तव में हम कमजोर होते हैं? या यह हमारा उस दूसरे इंसान पर विश्वास होता है, जो हम उससे अपनी भावनाएं शेयर कर देते हैं ।  यह सवाल मेरे मन में उलझ गया है । आज के दौर में क्या कोई साफ दिल का इंसान मिलना मुमकिन है? समझ नहीं आता कि बात हंसने की है या परेशान होने की। आज के दौर में जिंदगी इतनी उलझी हुई है कि अब सुलझ नहीं सकती।  तो क्यों न इस उलझन के उलझे हुए होने का भी मजा लिया जाए। उसे यूं ही छोड़ दिया जाए। कुछ बातें आधी अधूरी ही मजा देती हैं। बिजी रहता है मन , एक्साइटमेंट बना रहता है ; कि आगे क्या होता है? या क्या होने वाला था? क्या हो सकता था? अगर लाइफ में कुछ पुरा नहीं हो रहा तो ना होने दो। जो अधुरे पन्ने हैं जिंदगी की किताब के उन्हें पूरे करने की कोशिश ही मत करो । शायद जिंदगी में कोई एक्साइटमेंट आ जाए ? !शायद!

कभी-कभी कुछ ना करना भी अच्छा होता है।

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☘कभी-कभी कुछ ना करना भी अच्छा होता है।☘ आजकल टीवी पर एक प्रचार आया हुआ है; एक चॉकलेट कंपनी का, इसमें वह दिखाता है कि एक लड़का जो कि चॉकलेट खाते में इतना खो जाता है; कि उसके बगल में एक बूढ़ी महिला बैठी होती है;  उसकी छड़ी सामने सड़क पर गिर जाती है और जब वह चॉकलेट खाते हुए लड़के से कहती है कि बेटा मेरी छड़ी उठा दो तो लड़का चॉकलेट खाने में इतना मग्न रहता है कि वह उसकी बात को ध्यान नहीं दे पाता और अनसुना कर देता है। अंत में वह हार कर वह महिला खुद ही छडी उठाने के लिए आगे बढ़ती है तभी  ऊपर से कोई भारी चीज उसके बैठे हुए जगह पर गिर जाती है । इस प्रचार से यही देखने को मिला कि लड़का के कुछ ना करने से उस बूढ़ी महिला की जान बच गई । यह तो रही प्रचार की बात। अब आपको इसी पर एक कहानी सुनाता हूं ।यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है जो हर प्रकार के ताले को खोलने में माहिर था। चाहे वह जेल का ताला हो , तिजोरी का ताला हो , घर का ताला हो या किसी भी तरह का ताला वह कुछ सेकंड्स में ही खोल देता था । लोग हैरान हो जाते थे उसकी इस कला को देख कर। एक दिन एक चैलेंज रखा जाता है कि उसे...

वाह ! कोरोना ! वाह !

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🔆वाह ! कोरोना ! वाह ! 🔆 वाह ! कोरोना ! वाह ! , तु इत्तु सा से भी छोटा है, मगर तुने पुरी दुनिया के नाक में दम कर रखा है । बहुत ताकतवर देश जैसे इंग्लैंड, जर्मनी, इटली, स्पेन और अमेरिका, कनाडा आदि को भी तुने घुटने के बल पर ला दिया है । भारत में भी लॉकडाउन के दो-तीन दिनों बाद तक लगने लगा कि हमलोग तो तुझे अपने देश से भगा हीं देंगे ; लेकिन तु नहीं भागा । उसके बाद आया लॉकडाउन का एडवांस वर्जन लाॅकडाउन 2.0 ; मुझे लगता था की नया वर्जन पुराने से बेहतर होता है  खैर  तुने यहाँ भी अपनी जड़े जमा हीं ली। मुझे तो यह समझ नहीं आता कि तू चाइना का होकर भी इतने दिन कैसे टिक गया । तुम्हारी गति कम करने के लिए लॉकडाउन 3.0 लाया गया । इसमें कहा गया कि जरूरी चीजें खुलेंगी; स्कूल कॉलेज बंद रहेंगे । और हम अबतक समझते रहें कि पढ़ाई ज्यादा जरूरी है । लेकिन जरूरी तो शराब है । तेरी वजह से आज विश्व आर्थिक मंदी की दहलीज पर है और अभी तो हमलोग आने वाले समय में अगर कोरोना से बच गये तो और भी भयावह आर्थिक मंदी देखेंगे । तेरी (कोरोना) वजह से लगाया गया लॉकडाउन डिप्रेशन, आत्महत्य...

जीवन में अपेक्षा

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☘जीवन में अपेक्षा☘   इंसान कभी भी इस संसार से भौतिक जगत की संपत्ति लेकर अपने साथ नहीं जाता अगर वह कुछ लेकर जाता है तो अपने अंदर समेटे हुऐ ज्ञान को । तो कहने का अर्थ यह है कि; जो हम अपने साथ लेकर नहीं जा सकते  उसी के पीछे सबसे ज्यादा पड़े हुए हैं । अब मेरे कहने का यह बिल्कुल मतलब आप न निकाले कि मैं कोई मोक्ष का मार्ग बतलाने वाला हूं ऐसा नहीं है। मैं तो बस इतना कहना चाहता हूं कि जो हमारा नहीं है उसी को हम लेना चाहते हैं, ज्यादा से ज्यादा जमा करना चाहते हैं और जो हमारा अपना है , जो हमारे साथ जाएगा वह हम लेने को तैयार नहीं है । शायद इसीलिए हम कहीं ना कहीं दुखी भी हैं इन सभी दुखों का कारण है अपेक्षा।   आज के बदलते परिवेश ने शायद हर चीज के मायने बदल दिए हैं। यहां तक कि रिश्तो में भावनाओं का चलन भी एक हाथ दे और एक हाथ ले हो गया है। व्यक्ति को किसी भी रिश्ते में अपेक्षा उतनी ही रखनी चाहिए जितनी पूरी हो सके। अपेक्षा कभी भी ड्रीम सिचुएशन वाली नहीं होनी चाहिए। हम अगर वास्तविकता को ध्यान में रख कर किसी बात को सोचें तो कभी भी निराशा नहीं होगी। अपेक्षा में कोई वास्तविकता नही...

एक शिक्षक के रूप में मेरी भूमिका और मेरे दायित्व..

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एक शिक्षक के रूप में मेरी भूमिका और मेरे दायित्व शिक्षा में अध्यापक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। एक शिक्षक के रूप में मैं मध्य विद्यालय पतलूका , प्रखंड- तिलौथू , जिला रोहतास (बिहार) में कार्यरत हूं । समय के साथ-साथ नए-नए प्रयोगों और दृष्टिकोणों ने हर व्यवसाय एवं पद के स्वरूप को बदल दिया है। अब कोई भी कार्य अपने प्राचीन तौर-तरीके से करना उतना संभव नहीं रह गया है । जब ऐसा परिवर्तन समाज में आता है तब समाज के शिक्षित वर्ग का दायित्व और भी बढ़ जाता है और यह बात हम शिक्षकों पर भी लागू होती है । एक अध्यापक अध्यापन कार्य उचित तरीके से नहीं करता है तो वह अध्यापक कहलाने के लायक नहीं है। एक शिक्षक के रूप में मेरा कार्य मात्र कक्षा में केवल पाठ पढ़ाना ही नहीं होता, बल्कि पाठ पढ़ाकर उसके उद्देश्य, नैतिकता आदि को समझाना और सिखाना भी हमारा उत्तरदायित्व होता है। साथ ही साथ छात्रों को उचित निर्देशन प्रदान करना, विद्यार्थियों की भावनाओं को समझना, विद्यालय में सामाजिक वातावरण का निर्माण करना, विभिन्न पाठ्यक्रम आधारित क्रियाओं का संचालन करना आदि भी महत्वपूर्ण कार्य है। ...

भारतीय लोकतंत्र एवं भारतीय लोकतंत्र की चुनौतीयाँ / Indian democracy and Challenges to Indian Democracy

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🔆 भारतीय लोकतंत्र एवं भारतीय लोकतंत्र की चुनौतीयाँ  🔆 Indian democracy and Challenges to Indian Democracy   ➤ भारतीय लोकतंत्र आजादी की लड़ाई के दौरान स्वतंत्र भारत को जिस रास्ते पर चलना था, उसकी योजना बनाई गई थी। इसका उद्देश्य लोगों के हाथों में संप्रभु सत्ता निहित करना था। इसलिए, भारत ने लोकतंत्र का विकल्प चुना। एक ऐसी प्रणाली का होना आवश्यक था जहाँ समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व हो। हर समुदाय, धर्म और भाषा को समान दर्जा मिले। समानता का अर्थ है बिना किसी भेदभाव के स्थिति और अवसर की समानता। हमारी लोकतांत्रिक सरकार ने भी समाज के पिछड़े वर्ग के हितों की रक्षा की है। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने 1964 तक आजादी के बाद सरकार की बागडोर को नियंत्रित किया। लेकिन 1967 का वर्ष एक महत्वपूर्ण बिंदु साबित हुआ जब कुछ राज्य दलों (क्षेत्रीय दलों) को प्रमुखता मिली। यह भारतीय राजनीति के वास्तविक लोकतंत्रीकरण का काल था। गांधी परिवार ने 1977 तक भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर हावी होने के बाद। सभी परिवर्तनों और चुनौतियों के बावजूद, भारतीय लोकतंत्र अपने आगे की ओर अग्रसर...

भारत क्यों महान है ? / मेरा भारत महान

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भारत क्यों महान है ? क्या इसलिए कि हम आने वाले दिनों में चाइना की जनसंख्या से भी आगे निकल जाएंगे? .. क्या इसलिए कि आज भी भारत के लाखों परिवार गरीबी मैं जी रहे हैं ..?   नहीं.. सारी दुनिया एक परिवार है.. वसुदेव कुटुंबकम ऐसी संस्कृति, सभ्यता वाला हमारा देश जो हम सबके सीने में धड़कता हुआ हिस्सा है, उसी का तो यह सारा किस्सा है। भारत की संस्कृति अनेकता में एकता पर आधारित है। यह अनेकता में एकता एक शब्द ही नहीं बल्कि यह भारत देश की संस्कृति और विरासत में पूरी तरह लागू होता है। भारत देश विश्व के नक्शे में अपने रंगारंग और अनूठी संस्कृति की छाप छोड़े हुए हैं।   हम उस देश के वासी हैं जहां अव्यवस्था में भी व्यवस्था है , और हमारा मंगलयान किसी विदेशी फिल्म के बनने से भी सस्ता है । अपने पहले ही प्रयास में मंगल तक पहुंचने वाला देश भारत है । एक वो दिन था जब 1963 में हमारे पहले रॉकेट को एक साइकिल पर लाया गया था और आज इसरो विश्व के सबसे सफल अंतरिक्ष संगठनों में से एक है ।  वो क्या है ना अंदाजा सिर्फ ताकत का लगाया जा सकता है हौसलों का नहीं , और बात जब खेलों की होती है हौ...

सफलता के लिए लगातार सीखे

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कहानी शीर्षक : सफलता के लिए लगातार सीखे एक बार एक राजा ने एक बढई को राज काज के लिए नियुक्त किया। राजा उसके कार्य से काफी खुश था, क्योंकि उसने पहले ही महीने लगभग 18 पेड़ो को काटा था। अगले महीने उस बढई ने काफी कोशिश की, लेकिन वो केवल 15 पेड़ो को ही काट पाया। तीसरे महीने अपनी पूरी सामर्थ्य लगा कर भी, वह केवल 12 पेड़ो को ही काट पाया। धीरे धीरे उसकी पेड़ काटने की क्षमता कम होने लगी। एक दिन राजा उसके पास पंहुचा और उसके उत्पादकता में कमी का कारण पूछा- बढई ने जवाब दिया- “महाराज मेरी उम्र भी बढ़ रही है, और शरीर की शक्ति भी कम हो रही है, इसी कारण मेरी उत्पादकता में कमी हो रही है।” यह जानकर राजा ने पूछा “कितने समय पहले तुमने अपनी कुल्हारी को धार लगाई थी। आश्चर्यचकित हो कर बढई ने जवाब दिया केवल एक ही बार। तब राजा ने समझाया यही कारण है, कि तुम्हारी पेड़ काटने की उत्पादकता में दिन प्रतिदिन कमी आ रही है। पहले अपनी कुल्हाडी में धार लगाओ, फिर तुम्हारी उत्पादकता में बढ़ोत्तरी होगी। सीख काम को आसानी से करने के लिए चीजों की लगातार सीखना चाहिए, जिससे हम काम को आसानी से कर सके और हमारे का...

My YouTube channel Abhishek_sir M.A.

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26 January annual function of my school  1.  https://youtu.be/_mQ40uCbVw0 2.  https://youtu.be/HYoN1wg_1xs 3. Hind desh k niwashi sbhi jan ek hai..

मेरा परिचय

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नमस्कार दोस्तों मैं अभिषेक ! मैं बिहार के रोहतास जिले के एक सरकारी विद्यालय में शिक्षक पद पर कार्यरत हूं , और यह मेरा पहला पोस्ट है जिसकी शुरुआत मैंने माँ सरस्वती के तस्वीर से की है , ये तस्वीर मुझे प्रेरणा देती है । माँ के आशीर्वाद से और आप सभी का प्यार मिलता रहा तो आपके लिए उपयोगी , शैक्षिक, प्रेरित और इत्यादि पोस्ट करता रहूँगा। चूंकि मैं एक नया ब्लोगर हूँ और मुझसे कुछ त्रुटियाँ हो सकती है , आप सभी मुझे क्षमा करने का प्रयास करेंगे और मेरा मार्गदर्शन करेंगे।