जीवन में अपेक्षा
☘जीवन में अपेक्षा☘
इंसान कभी भी इस संसार से भौतिक जगत की संपत्ति लेकर अपने साथ नहीं जाता अगर वह कुछ लेकर जाता है तो अपने अंदर समेटे हुऐ ज्ञान को । तो कहने का अर्थ यह है कि; जो हम अपने साथ लेकर नहीं जा सकते उसी के पीछे सबसे ज्यादा पड़े हुए हैं । अब मेरे कहने का यह बिल्कुल मतलब आप न निकाले कि मैं कोई मोक्ष का मार्ग बतलाने वाला हूं ऐसा नहीं है। मैं तो बस इतना कहना चाहता हूं कि जो हमारा नहीं है उसी को हम लेना चाहते हैं, ज्यादा से ज्यादा जमा करना चाहते हैं और जो हमारा अपना है , जो हमारे साथ जाएगा वह हम लेने को तैयार नहीं है । शायद इसीलिए हम कहीं ना कहीं दुखी भी हैं इन सभी दुखों का कारण है अपेक्षा।
आज के बदलते परिवेश ने शायद हर चीज के मायने बदल दिए हैं। यहां तक कि रिश्तो में भावनाओं का चलन भी एक हाथ दे और एक हाथ ले हो गया है। व्यक्ति को किसी भी रिश्ते में अपेक्षा उतनी ही रखनी चाहिए जितनी पूरी हो सके। अपेक्षा कभी भी ड्रीम सिचुएशन वाली नहीं होनी चाहिए। हम अगर वास्तविकता को ध्यान में रख कर किसी बात को सोचें तो कभी भी निराशा नहीं होगी। अपेक्षा में कोई वास्तविकता नहीं होती ।
हालांकि अपेक्षा एक प्रकार का मनोभाव है, पर इस के बिना जीवन अधूरा सा लगता है ; क्योंकि कई बार जीवन में सफलता हासिल करने में भी अपने से जुड़े किसी अपने की अपेक्षा का बहुत बड़ा हाथ होता है । उसकी अपेक्षा हमें जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है ।
संसार में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होगा, जिसे कभी न कभी, किसी न किसी से कोई अपेक्षा नहीं रही होगी। और जब उसकी उम्मीदें टूटती हैं , तब वह पीड़ित हो जाता है। यह जरूरी नहीं कि व्यक्ति की सारी अपेक्षाएं पूर्ण हों ही। साथ ही इंसान के लिए यह भी संभव नहीं है कि अपेक्षाएं रखे ही न।
अपेक्षाओं के बूते पर ही तो वह आगे बढ़ता है। अपेक्षाओं के अभाव में जीवन व्यर्थ है। अपेक्षाएं मन का मोह है। चाहे व्यक्ति की अपेक्षाएं पूरी न हों, परन्तु वह अपेक्षा रखता जरूर है।
माता-पिता बच्चों से, बच्चे माता-पिता से, पति पत्नी से, पत्नी पति से, भाई बहन से , बहन भाई से , प्रेमी प्रेमिका से, प्रेमिका प्रेमी से, गुरु शिष्य से, शिष्य गुरु से, दोस्त को दोस्त से अपेक्षाएं रहती ही हैं।
फिर भी अगर कोई व्यक्ति अपनी लाइफ में खुश रहना चाहता है तो किसी से ज्यादा अपेक्षा न करे. हमें किसी से भी कोई अपेक्षा रखे बिना ही जीने की आदत डालनी चाहिए। तभी हमारी सभी समस्याएं अपनेआप खत्म हो जाएंगी। यह एक कठिन कार्य है पर इस के लिए एक छोटी सी कोशिश तो की ही जा सकती है. ज्यादा अपेक्षा रखना खुद को तनाव में डालना है क्योंकि एक के बाद एक अपेक्षाओं का ग्राफ बढ़ता ही जाता है। मनुष्य का यह स्वभाव है कि वह हर किसी से अपेक्षा करता है और कभी कभी ये अपेक्षाएं जरूरत से ज्यादा हो जाती हैं। ऐसा होने से जब हमें हमारी ये अपेक्षाएं पूरी होती नहीं दिखाई देतीं तब क्रोध, , निराशा और अवसाद हमारे साथी बन जाते हैं।
हमारे पास इतनी शक्ति का होना जरूरी है कि हम उम्मीदों की टूटने की पीड़ा सह सके।
इसी सहनशक्ति के आधार पर हमारी सच्ची ताकत और हमारे मानव जीवन की सार्थकता साबित होती है।
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ReplyDeleteThanku... 😊
DeleteVery nice 👌👍....
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