वाह ! कोरोना ! वाह !

🔆वाह ! कोरोना ! वाह ! 🔆


वाह ! कोरोना ! वाह ! , तु इत्तु सा से भी छोटा है, मगर तुने पुरी दुनिया के नाक में दम कर रखा है ।

बहुत ताकतवर देश जैसे इंग्लैंड, जर्मनी, इटली, स्पेन और अमेरिका, कनाडा आदि को भी तुने घुटने के बल पर ला दिया है । भारत में भी लॉकडाउन के दो-तीन दिनों बाद तक लगने लगा कि हमलोग तो तुझे अपने देश से भगा हीं देंगे ; लेकिन तु नहीं भागा । उसके बाद आया लॉकडाउन का एडवांस वर्जन लाॅकडाउन 2.0 ; मुझे लगता था की नया वर्जन पुराने से बेहतर होता है 

खैर  तुने यहाँ भी अपनी जड़े जमा हीं ली। मुझे तो यह समझ नहीं आता कि तू चाइना का होकर भी इतने दिन कैसे टिक गया । तुम्हारी गति कम करने के लिए लॉकडाउन 3.0 लाया गया । इसमें कहा गया कि जरूरी चीजें खुलेंगी; स्कूल कॉलेज बंद रहेंगे । और हम अबतक समझते रहें कि पढ़ाई ज्यादा जरूरी है । लेकिन जरूरी तो शराब है ।

तेरी वजह से आज विश्व आर्थिक मंदी की दहलीज पर है और अभी तो हमलोग आने वाले समय में अगर कोरोना से बच गये तो और भी भयावह आर्थिक मंदी देखेंगे ।

तेरी (कोरोना) वजह से लगाया गया लॉकडाउन डिप्रेशन, आत्महत्या, तनाव, चिड़चिड़ापन आदि का बड़ा कारण बनेगा और लोगों का जीवन सदैव के लिए बदल जाएगा।
तुने एक ही दिन में हमें मानव मन के बारे में बहुत कुछ समझाया है। लोग एक ही दिन में अचानक राशन की दुकानों पर उमड़ पड़े, सब कुछ खरीदने की होड़ में मॉल, दुकानें खाली कर दीं , और  कालाबाजारी को जगह दी। तुने यह दिखा दिया कि हम अंदर से कितने असुरक्षित और  आत्मकेंद्रित हैं। किसी भी तरह से मैं और मेरा परिवार जिंदा रहे, सुख से रहे,परोपकार के लिए सोशल मीडिया है ही,  यही भावना हमारे व्यवहारों में दिखाई दी। यह तय है कि एक सीमा के बाद व्यक्ति परिवार की भी बलि चढ़ा कर स्वयं को बचाएगा।
तुने जीवन की अनिश्चितता को एक ही बार में समझा दिया है। सारी योजनाएं स्थगित हो गई हैं और अचानक से समझ में आ गया है कि क्या-क्या जरूरी है और क्या-क्या गैर जरूरी ।
और तो और कोरोना तेरी वजह से मेरे दो दोस्तों की शादी होने वाली थी वह भी टल गई । बिहारी शब्दों में कहूँ तो तुने मेरा पुरी- बुन्दिया छीन लिया ।
बहुत सारे लोगों का व्यक्तित्व इसके बाद हमेशा के लिए बदल जाएगा, क्योंकि कोरोना ने अचानक सबकी दौड़ को रोक दिया है और सब कुछ ठहर सा गया है।
तेरी वजह से एक चीज अच्छी मुझे दिखाई दी कि पृथ्वी का वातावरण कुछ हद तक साफ हुआ, नदियों के पानी का प्रदूषण स्तर गिरा।
एक मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि हमने बेहतर जीवन व्यतीत किया या नहीं यह जानने का सबसे बेहतर तरीका है कि हम यह सोचें कि यदि हम आज मरने वाले हैं तो हमें अफसोस होगा या नहीं।यदि हम मरने के बारे में घबराकर सोचते हैं एवं अफसोस के साथ सोचते हैं तो यह तय है कि हमने बेहतर जीवन नहीं व्यतीत किया।
वाह ! कोरोना ! वाह ! 

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