एक शिक्षक के रूप में मेरी भूमिका और मेरे दायित्व..

एक शिक्षक के रूप में मेरी भूमिका और मेरे दायित्व




शिक्षा में अध्यापक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। एक शिक्षक के रूप में मैं मध्य विद्यालय पतलूका , प्रखंड- तिलौथू , जिला रोहतास (बिहार) में कार्यरत हूं ।


समय के साथ-साथ नए-नए प्रयोगों और दृष्टिकोणों ने हर व्यवसाय एवं पद के स्वरूप को बदल दिया है। अब कोई भी कार्य अपने प्राचीन तौर-तरीके से करना उतना संभव नहीं रह गया है । जब ऐसा परिवर्तन समाज में आता है तब समाज के शिक्षित वर्ग का दायित्व और भी बढ़ जाता है और यह बात हम शिक्षकों पर भी लागू होती है । एक अध्यापक अध्यापन कार्य उचित तरीके से नहीं करता है तो वह अध्यापक कहलाने के लायक नहीं है।

एक शिक्षक के रूप में मेरा कार्य मात्र कक्षा में केवल पाठ पढ़ाना ही नहीं होता, बल्कि पाठ पढ़ाकर उसके उद्देश्य, नैतिकता आदि को समझाना और सिखाना भी हमारा उत्तरदायित्व होता है। साथ ही साथ छात्रों को उचित निर्देशन प्रदान करना, विद्यार्थियों की भावनाओं को समझना, विद्यालय में सामाजिक वातावरण का निर्माण करना, विभिन्न पाठ्यक्रम आधारित क्रियाओं का संचालन करना आदि भी महत्वपूर्ण कार्य है।

मैं जब कक्षा में जाता हूं तो इस बात पर भी ध्यान देने की कोशिश करता हूं उन्हें सिर्फ किताबी ज्ञान तक ही सीमित ना रखा जाए। पुस्तकीय ज्ञान तो परीक्षा में पास होने का साधन हो सकता है, लेकिन जब हम विभिन्न नए-नए अधिगम में और रोचक तथ्यों के बारे में बताते हैं तो ऐसे में हम शिक्षा के महत्व को उनके मन में विकसित कर रहे होते हैं। कक्षा में सभी छात्र एक समान नहीं होते उनकी मानसिक योग्यता और रुचि अलग- अलग होती है ; ऐसे में सभी छात्रों की समझ को भी समझना होता है और एक मनोवैज्ञानिक के तौर पर कार्य करना पड़ता है।


एक शिक्षक के रूप में मेरा दायित्व ना सिर्फ छात्रों के प्रश्नों का उत्तर देना है ; बल्कि उनके मन में प्रश्न उठाना भी है । देखी-दिखाई , सुनी-सुनाई, पढी-पढ़ाई बातों को सीधे-सीधे मान लें तो शिक्षा अधूरी रह गई है । एक शिक्षक के रूप में मैं प्रयास करता हूं कि मेरे छात्र सिर्फ जानना नहीं, देखना भी सीखे एक फ्रेम लगाना सीखे । जिस फ्रेम को वह जीवन में सही जगह रखकर अपने मन मुताबिक जीवन की तस्वीर बनाएं । मेरा मकसद होता है कि मैं उसे खास चीज को खोजना ना सिखाऊं , मैं उसे 'क्या' और 'क्यों' के साथ-साथ 'कैसे' भी देखना सिखाऊं।



इस साल 8 अगस्त को मेरे एक शिक्षक के रूप में 12 वर्ष पूर्ण हो जाएंगे। इन 12 वर्षों में पिछले 6 वर्षों से एक सरकारी शिक्षक के रूप में कार्यरत हूँ । इसके पहले जब मैं 2008 में मैट्रिक की परीक्षा पास की उसके बाद से ही वर्ग 1 से 9 के बच्चों को पढ़ाने लगा था। कितने बच्चों को तो मैंने गोद में बिठाया और कंधे पर चढ़ाकर खेलाया है । अब वह कंधे पर हाथ रखकर घूमने लायक हो गए हैं । 12 साल अपने आप में जिंदगी है और एक शिक्षक के इस जीवन में मैंने शिक्षक का आदर, पिता जैसा बच्चों का प्रेम, और दोस्तों की यारी खूब कमाई है । 

मेरे भीतर के शिक्षक को और बल और ज्ञान मिले जिससे मैं अपना दायित्व और अच्छे से निभा पाऊं; इसलिए दुआ दीजिएगा ।

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